स्वास्थ्य और मातृत्व: सुरक्षित माँ ही सशक्त समाज की नींव है
डॉ इलाक्षी शुक्ला
क्या आपने कभी सोचा है कि किसी समाज की असली ताकत कहाँ छिपी है? वो तो महिलाओं के स्वास्थ्य में बसती है। कल्पना कीजिए, एक गर्भवती माँ जो थकान महसूस कर रही है, लेकिन परिवार कहता है, “ये तो सामान्य है।” मातृत्व सिर्फ बच्चा पैदा करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को मजबूत नींव देना है। अगर माँ हँसती-खेलती रहे, तो पूरा परिवार खिल उठता है—और फिर समाज, राष्ट्र भी चमक उठता है।मैंने खुद अपने गाँव में देखा था, जहाँ राधा नाम की एक बहू एनीमिया से जूझ रही थी। उसे लगा, “ये तो मेरी किस्मत है।” लेकिन समय पर डॉक्टर पहुँचे, दवा दी, और आज वो दो स्वस्थ बच्चों की माँ है। भारत में संस्थागत प्रसव, जननी सुरक्षा योजना, टीकाकरण—ये सब प्रयास रंग ला रहे हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी गर्भावस्था डर का पर्याय बनी हुई है। क्यों? क्योंकि कुपोषण, रक्तहीनता, हाई बीपी जैसी परेशानियाँ माँ-बच्चे दोनों को निगल लेती हैं।कई बहनें इन्हें “थोड़ी कमजोरी” कहकर नजरअंदाज कर देती हैं। लेकिन सोचिए, अगर समय पर चेकअप हो जाए, तो ये सब टल सकता है! मातृत्व सिर्फ डिलीवरी तक नहीं—प्रेग्नेंसी की देखभाल, सुरक्षित प्रसव, डिलीवरी के बाद का ख्याल और मानसिक शांति—सब बराबर जरूरी हैं। प्रसवोत्तर अवसाद तो आजकल आम है, लेकिन हम चुप रह जाते हैं। एक दोस्त की पत्नी ने बताया, “बेबी आने के बाद उदासी ऐसी लगी जैसे दुनिया खत्म हो गई।” समाज को ये स्वीकारना होगा।ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, मशीनें पहुँच ही नहीं पातीं। प्राथमिक केंद्र हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहाँ? यहाँ आशा दीदी और आंगनबाड़ी बहनें ही तो फरिश्ते हैं—वे घर-घर जाकर बताती हैं, पकड़ लाती हैं। लेकिन हमें भी साथ देना होगा।माँ को सम्मान देना सिर्फ शब्द नहीं, काम है। उसे अच्छा खाना, आराम, प्यार और फैसले लेने की आजादी दो। परिवार और समाज मिलकर कहें—”ये हमारी साझा जिम्मेदारी है, सिर्फ तेरी नहीं।” याद रखिए, कुपोषित माँ से स्वस्थ बच्चा कैसे पैदा होगा? स्वस्थ समाज कैसे बनेगा?आज जरूरत है योजनाओं से ऊपर उठकर दिल से सोचने की। हर गर्भवती को सुरक्षित, खुश रखें। जब हर माँ मुस्कुराएगी, तभी भारत सच्चा विकसित बनेगा। आइए, हम सब मिलकर ये वादा करें—अपनी माताओं, बहनों के लिए।

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