जितना गिराओगे, उतना उठूँगा – क्योंकि मैं आशीष पटेल हूँ
ओजस्वी किरण डेक्स
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत से नेता सत्ता के सहारे पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो सत्ता से पहले विचार और आत्मसम्मान को चुनते हैं। कैबिनेट मंत्री आशीष सिंह पटेल का राजनीतिक सफर इसी श्रेणी में आता है। उनका जीवन किसी सुविधाजनक राजनीतिक विरासत की कहानी नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष, वैचारिक टकराव और बार-बार गिराए जाने की कोशिशों के बीच खड़े रहने का प्रमाण है। उनका संदेश साफ है—गिराया जा सकता है, लेकिन रोका नहीं जा सकता।
वर्तमान में वे उत्तर प्रदेश सरकार में तकनीकी शिक्षा, उपभोक्ता संरक्षण तथा बाट-माप जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाल रहे हैं। ये ऐसे विभाग हैं जिनका सीधा संबंध आम नागरिक, छात्र और उपभोक्ता से है। आशीष पटेल की राजनीति की खासियत यही रही है कि वे मंत्रालयों को केवल सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप के औज़ार के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि उनके निर्णय प्रशासनिक होने के साथ-साथ वैचारिक भी दिखाई देते हैं।
आशीष पटेल को राजनीति विचारों के रूप में मिली। सत्ता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की वह चेतना उन्हें मिली जिसने पिछड़े और वंचित समाज को राजनीतिक पहचान दी। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि ने उन्हें सुविधा-केंद्रित राजनीति से अलग खड़ा किया। उनकी राजनीति का केंद्र वह समाज रहा है जिसकी आवाज़ अक्सर नीति-निर्माण में दबा दी जाती है। उनके लिए सत्ता लक्ष्य नहीं, बल्कि अधिकार दिलाने का साधन है।
शिक्षा के स्तर पर भी उनका जीवन संघर्ष का उदाहरण है। साधारण परिस्थितियों में पली-बढ़ी उनकी शैक्षणिक यात्रा ने उन्हें जमीनी यथार्थ से जोड़ा और चित्रकूट की मिट्टी ने बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में आत्मसम्मान और अपनों के लिए लड़ने का अदम्य साहस भर दिया था।
बुंदेलखंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (BIET), झांसी से बी.टेक करने वाले आशीष पटेल ने यह समझा कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि आत्मबल और आत्मनिर्भरता का आधार है। यही सोच आगे चलकर उनकी नीतियों में दिखाई देती है, जहाँ तकनीकी शिक्षा को रोज़गार और कौशल से जोड़ा गया।
यह एक तथ्य है कि जिस समय आशीष पटेल ने सक्रिय नेतृत्व संभाला, उस समय अपना दल (सोनेलाल) को मुख्यधारा की राजनीति में गंभीरता से नहीं लिया जाता था। संगठन था, कार्यकर्ता थे, लेकिन दिशा, विस्तार और प्रभाव की कमी थी। पार्टी को हाशिये की राजनीति में सीमित समझा जाता था। यही वह मोड़ था जहाँ से उनका असली संघर्ष शुरू होता है।
आशीष पटेल के नेतृत्व में पार्टी ने केवल चुनावी विस्तार नहीं किया, बल्कि अपनी राजनीतिक अस्मिता स्थापित की। वे कार्यकारी अध्यक्ष बने, उत्तर प्रदेश विधान परिषद पहुँचे और पार्टी सत्ता में सहभागी बनी। संगठन को बूथ स्तर तक मज़बूती मिली, युवाओं और शिक्षित वर्ग की भागीदारी बढ़ी और पार्टी ने मुद्दा-आधारित, आत्मसम्मान वाली राजनीति की पहचान बनाई। आज पार्टी केवल सत्ता का हिस्सा नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में अपनी बात रखने की स्थिति में है—और यही नेतृत्व का वास्तविक अंतर है।
तकनीकी शिक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्य ठोस तथ्यों के साथ सामने आते हैं। पॉलिटेक्निक संस्थानों में ट्रेनिंग-कम-प्लेसमेंट सेल की स्थापना, नए पॉलिटेक्निक कॉलेजों की शुरुआत और पाठ्यक्रमों को उद्योग-अनुकूल बनाना—ये निर्णय इस सोच को दर्शाते हैं कि गरीब और पिछड़े वर्ग का छात्र केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि रोज़गार के योग्य बने। उपभोक्ता संरक्षण विभाग में भी उन्होंने शिकायत निवारण तंत्र को अधिक प्रभावी बनाकर आम नागरिक को न्याय के करीब लाने का प्रयास किया।
सामाजिक न्याय के प्रश्न पर आशीष पटेल की राजनीति सबसे अधिक मुखर दिखाई देती है। तकनीकी शिक्षा विभाग में OBC और SC/ST कर्मचारियों को पूर्ण पदोन्नति अधिकार दिलाने या शैक्षिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व की बात—उन्होंने सार्थक काम किया। तकनीकी शिक्षा विभाग में उच्च स्तर पर वंचित एवं पिछड़े समाज की भागीदारी अब 50% हो गई है। 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को नवोदय विद्यालयों, केंद्रीय विद्यालयों, सैनिक स्कूलों और NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में लागू कराने का काम, जाति-आधारित जनगणना और अलग OBC कल्याण मंत्रालय की मांग—ये सब उनके वैचारिक साहस के उदाहरण हैं। यह राजनीति सुरक्षित नहीं है,लेकिन उन्होंने जोखिम से पीछे हटना नहीं सीखा।
स्वाभाविक है कि ऐसा रुख विरोध को जन्म देता है। आशीष पटेल का विरोध केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि सत्ता और गठबंधन के भीतर भी हुआ। व्यक्तिगत आरोप लगे, दबाव बनाए गए, लेकिन उन्होंने प्रतिक्रिया की राजनीति नहीं की। उन्होंने संयम, स्पष्टता और कर्म से जवाब दिया। हर विरोध उनके लिए बाधा नहीं, बल्कि एक और परीक्षा साबित हुआ—और हर परीक्षा ने उन्हें और मज़बूत किया।
आज जब राजनीति में चुप रहना परिपक्वता और झुक जाना समझदारी कहलाने लगा है, आशीष पटेल उस राजनीति का प्रतीक हैं जो आत्मसम्मान के साथ सत्ता में रहने का साहस रखती है। उनका जीवन उन सभी के लिए उत्तर है जो कहते हैं कि सिद्धांतों के साथ राजनीति नहीं की जा सकती।
और इसलिए उनका संकल्प अडिग है—
“जितना गिराओगे, उतना उठूँगा — क्योंकि मैं आशीष पटेल हूँ।”

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