राजमाता जिजाबाई: त्याग, तपस्या और राष्ट्रनिर्माण की अद्वितीय प्रेरणा

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राजमाता जिजाबाई: त्याग, तपस्या और राष्ट्रनिर्माण की अद्वितीय प्रेरणा

छत्रपति शिवाजी महाराज को गढ़ने वाली माता, जिनके संस्कारों से जन्मा स्वराज्य का विचार

ओजस्वी किरण विशेष

भारतीय इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका योगदान समय की सीमाओं से परे होता है। राजमाता जिजाबाई ऐसी ही एक महान नारी थीं, जिनका जीवन केवल मातृत्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने एक पूरे राष्ट्र की चेतना को आकार दिया। वे छत्रपति शिवाजी महाराज की माता ही नहीं, बल्कि उनकी प्रथम गुरु, प्रेरणा और नैतिक आधार भी थीं।

राजमाता जिजाबाई ने अपने जीवन में संघर्ष, अस्थिरता और अत्याचारों को बहुत निकट से देखा। इन्हीं परिस्थितियों ने उनके भीतर अटूट साहस और राष्ट्रधर्म के प्रति गहरी निष्ठा पैदा की। उन्होंने अपने पुत्र शिवाजी के बालमन में बचपन से ही स्वराज्य, धर्मरक्षा और प्रजा-कल्याण के संस्कार बोए। रामायण, महाभारत और वीर कथाओं के माध्यम से वे उन्हें सत्य, न्याय और पराक्रम का पाठ पढ़ाती रहीं।

एक माँ के रूप में जिजाबाई का योगदान अद्वितीय था। उन्होंने शिवाजी को केवल युद्धकला नहीं सिखाई, बल्कि यह भी सिखाया कि सत्ता का अर्थ सेवा है और राजा का धर्म जनता की रक्षा। यही कारण रहा कि शिवाजी महाराज का शासन केवल तलवार की ताकत से नहीं, बल्कि न्याय, करुणा और लोककल्याण की भावना से पहचाना गया।

राजमाता जिजाबाई स्वयं भी अपराजेय संकल्प की प्रतीक थीं। पति की अनुपस्थिति और कठिन राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी आत्मबल नहीं खोया। अपने धैर्य, तपस्या और दूरदृष्टि से उन्होंने एक ऐसे नेतृत्वकर्ता को गढ़ा, जिसने भारत के इतिहास को नई दिशा दी। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि सशक्त मातृत्व ही सशक्त राष्ट्र की नींव होता है।

आज के समय में, जब समाज नैतिक मूल्यों और संस्कारों की बात करता है, तब राजमाता जिजाबाई का जीवन विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। उनकी प्रेरणा यह संदेश देती है कि यदि माताएँ जागरूक, शिक्षित और राष्ट्रचिंतन से युक्त हों, तो कोई भी शक्ति राष्ट्र को कमजोर नहीं कर सकती।

पूरे विश्व में राजमाता जिजाबाई की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है—कि हम आने वाली पीढ़ी को कौन-से संस्कार दे रहे हैं।

ओजस्वी किरण परिवार राजमाता जिजाबाई को कोटि-कोटि नमन करता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि त्याग और तपस्या से ही पराक्रम जन्म लेता है, और पराक्रम से ही स्वाभिमानी राष्ट्र का निर्माण होता है।

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