सोमनाथ से स्वाभिमान तक,पहले आक्रमण से पुनर्निर्माण तक की गाथा और सरदार पटेल की निर्णायक भूमिका
ओजस्वी किरण डेक्स
सोमनाथ केवल अतीत की कोई घटना नहीं, बल्कि भारत की जीवित चेतना है। यह कथा हमें याद दिलाती है कि सभ्यताएँ केवल पत्थरों से नहीं बनतीं, बल्कि स्मृति, साहस और सतत पुनर्निर्माण की भावना से जीवित रहती हैं।
आज, जब इतिहास को लेकर भ्रम, अधूरा ज्ञान और चयनात्मक स्मृति सामने आती है, तब सोमनाथ की पूरी और संतुलित गाथा प्रस्तुत करना आवश्यक हो जाता है—ताकि नई पीढ़ी समझ सके कि यह मंदिर कितनी बार टूटा, कितनी बार खड़ा हुआ और हर बार और अधिक आत्मविश्वास के साथ खड़ा हुआ।
यह कहानी आज इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि यह स्वतंत्र भारत की वैचारिक रीढ़ को उजागर करती है—जब राष्ट्र निर्माण के आरंभिक वर्षों में सरदार वल्लभभाई पटेल ने पुनर्निर्माण का निर्णय लेकर स्पष्ट किया कि आज़ादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सभ्यता की पुनर्स्थापना भी है।
आक्रमणों का कालखंड:
टूटना, लुटना—फिर भी टिके रहना
इतिहास के पन्नों में सोमनाथ मंदिर पर अनेक आक्रमणों का उल्लेख मिलता है। 725 ईस्वी में सिंध के सूबेदार अल-जुनेद के समय पहला बड़ा आक्रमण हुआ। इसके बाद 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी के हमले ने मंदिर को गहरी क्षति पहुँचाई—मूर्तियों का ध्वंस और अपार संपदा की लूट हुई।
आगे चलकर खिलजी और तुगलक काल में भी मंदिर को नुकसान पहुँचा। 1665 ईस्वी में औरंगज़ेब के आदेश से मंदिर गिराया गया और पूजा बाधित हुई।
इसके बावजूद, हर दौर में स्थानीय शासकों और समाज ने पुनर्निर्माण कराया। यह सिलसिला बताता है कि सोमनाथ केवल एक संरचना नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता का स्थायी प्रतीक था।
स्वतंत्रता के बाद का निर्णायक मोड़
1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत राष्ट्र-निर्माण के कठिन दौर से गुजर रहा था। इसी समय 13 नवंबर 1947 को तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
यह फैसला प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का उद्घोष था—कि स्वतंत्र भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत को स्वयं पुनः स्थापित करेगा।
सरदार पटेल का योगदान:
विचार से क्रियान्वयन तक सरदार पटेल की भूमिका तीन स्तरों पर निर्णायक रही—
दृष्टि और संकल्प : उन्होंने स्पष्ट कहा कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण राष्ट्र की आत्मा को पुनर्जीवित करने का कार्य है।
जन-आधारित मॉडल : उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि निर्माण जनदान से हो—सरकारी कोष पर निर्भर हुए बिना। इससे यह मंदिर जनता की आस्था का सामूहिक उपक्रम बना।
संस्थागत व्यवस्था : उनके मार्गदर्शन में कार्ययोजना बनी और आगे चलकर दायित्व के. एम. मुंशी को सौंपा गया, जिन्होंने परियोजना को साकार रूप दिया।
मई 1950: सोमनाथ मंदिर की आधारशिला रखी गई।
1951: मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ।
11 मई 1951: भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कर-कमलों से प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
मंदिर का स्थापत्य प्राचीन शिल्प-परंपरा के अनुरूप रखा गया, ताकि यह अतीत और वर्तमान के बीच सांस्कृतिक सेतु बने।
राष्ट्र के लिए संदेश
सोमनाथ का पुनर्निर्माण किसी एक व्यक्ति या काल की घटना नहीं, बल्कि सभ्यता की निरंतरता का प्रमाण है। सरदार पटेल का योगदान इसलिए ऐतिहासिक है कि उन्होंने विचार, साहस और संगठन—तीनों को एक सूत्र में पिरोकर यह कार्य सिद्ध किया।
यह निर्णय बताता है कि स्वतंत्र भारत अपनी विरासत को लेकर आत्मविश्वासी और स्पष्ट है।
सोमनाथ की कथा—आक्रमण, ध्वंस और पुनर्निर्माण—भारत की अदम्य चेतना की कहानी है। और इस आधुनिक अध्याय के शिल्पी के रूप में सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।


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