भारत ने पहली बार 4500 वर्ष पुराने तांबे के भाले पर आदि-शिव की मुखाकृति की किया खोज,पूरा कबीला करता था शस्त्र धारण  : विजय कुमार

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भारत ने पहली बार 4500 वर्ष पुराने तांबे के भाले पर आदि-शिव की मुखाकृति की किया खोज,पूरा कबीला करता था शस्त्र धारण  : विजय कुमार

ओजस्वी किरण ब्यूरो 

लखनऊ ब्यूरो । भारत ने पहली बार 4500 वर्ष पुराने (2500 वर्ष ई०पू०) तांबे के हार्पून (भाले) पर आदि-शिव की मुखाकृति की खोज के बारे में पुरातत्ववेत्ता विजय कुमार ने बताया कि आदि-शिव की मुखाकृति वाले 4500 वर्ष पुराने हार्पून (भाले) OCP संस्कृति के है। यह सरकृतिः गगा घाटी की संस्कृति है। यह पूर्व से पश्चिम जालंधर से अयोध्या तक फैली हुई है। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण, हिमालय और विन्ध्य पर्वत श्रेणियों/ आरावली पर्वत के मध्य है।OCP संस्कृति का कालखण्ड 5000 ई०पू० से 1700 ई०पू० तक है। इसके विपरीत Mature Harappa सस्कृति का कालखण्ड 2500 ई०पू० से 2000 ई०पू० तक ही है।इस सस्कृति के लोग विभिन्न प्रकार के हथियार उपकरण जैसे भाले, तलवारे, छोटी तलवारें, हार्पून, कुल्हाड़िया, चिजेल, आरी गडात चाकू, कड़े, रापी का प्रयोग करते थे। हथियारों का जखीरा गांव के बीच एक सुरक्षित स्थान पर रखा जाता था। OCP संस्कृति के गांव 1-2 वर्ग किलो मीटर में फैले होते थे। इनके खेत भी इसी क्षेरसल में फैले होते थे। हर परिवार अपने खेल के बीच में झोपड़ी बनाकर रहता था। झोपडी सामान्य रूप से गोलाकार होती थी। 4. पूरा कबीला शस्त्र धारण करता था क्योंकि जहां भी यह हथियार पाये गये है, वह सब गांव के बीच मे किसी सुरक्षित स्थान पर पाये जाते है। एक गाव में हथियारों के जखीरे का वजन 100 किलोग्राम से लेकर 250 किलोग्राम तक होता था। इतनी बडी संख्या में हडप्पा कालीन स्थलों से भी तांबे के हथियार नहीं पाये गये है।इनकी ताबे की इलाई की तकनीक बहुत उन्नत थी। इसे वह उत्तराखण्ड और राजस्थान की तांबे की खानों से प्राप्त करते थे। यह पहले तांबे के हथियारों को सांचे में ढालते थे और फिर उसको पीटकर धार बनाते थे अथवा उसको आवश्यक्तानुरूप आकार देते थे।

इनके ताबे के हथियार बनाने की तकनीक विश्व में और कहीं नहीं पायी जाती है।

हथियारों के जखीरे के साथ ही इनके युद्ध के देवताओं की प्रतिमायें भी रखी जाती थी

इनके युद्ध के देवता गरूड़ और कार्तिकेय थे, जिन्हें यह ध्वज के रूप में लेकर युद्ध के मैदान में जाते थे। गुप्त सम्राट भी गरूड़-ध्वज का प्रयोग करते थे जैसा कि उनके कुछ सोने के सिक्को पर दिखाया गया है। गुप्तो से पूर्व पश्चिमी भारत के यौद्धेय शासक अपने सिक्कों पर हार्पून लिये हुये कार्तिकेय की आकृति बनाते थे और सिक्के के दूसरी तरफ देवी सष्ठी की आकृति बनाते थे।

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