स्क्रीन की चकाचौंध में खो रही पीढ़ी, बढ़ रही अवसाद और आत्महत्याएँ : आकाश सिंह

1 min read

स्क्रीन की चकाचौंध में खो रही पीढ़ी, बढ़ रही अवसाद और आत्महत्याएँ : आकाश सिंह

ओजस्वी किरण ब्यूरों लखनऊ

लखनऊ। तकनीक हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। मोबाइल फोन और डिजिटल उपकरणों ने सुविधाएँ तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ कई सामाजिक व मानसिक चुनौतियाँ भी तेजी से गहराती जा रही हैं। विशेषकर युवाओं और छात्रों के बीच बढ़ता स्क्रीन टाइम एक गंभीर चिंता का विषय है, जो रिश्तों में दूरी, संवादहीनता और मानसिक तनाव को जन्म दे रहा है।

छात्र आकाश सिंह ने कहा कि छात्र आत्महत्याओं के बढ़ते आँकड़े समाज को झकझोरते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा आँकड़े बेहद चिंताजनक हैं भारत में साल 2023 में 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की, और यह पिछले दशक में लगभग 65% की बढ़ोतरी को दर्शाता है, इसके अलावा कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि लगभग, 70% कॉलेज छात्र चिंता (एंज़ाइटी), और 60% से अधिक डिप्रेशन का सामना कर रहे हैं, ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी हैं। यह स्पष्ट है कि मानसिक तनाव अब परिवारों की चारदीवारी से बाहर निकलकर एक राष्ट्रीय सामाजिक समस्या बन चुका है।

उन्होंने स्क्रीन टाइम को परिवार से दूरी और संवादहीनता का कारण माना। आज घरों का माहौल बदल गया है। वह समय जब परिवार साथ बैठकर भोजन करता था, बातें होती थीं, अनुभव बंटते थे अब मोबाइल स्क्रीन ने वह जगह ले ली है। माता-पिता और बच्चे दोनों ही फोन में व्यस्त, संवाद का स्तर लगातार कम, भावनात्मक दूरी बढ़ती जा रही है। 

आकाश सिंह ने आगे कहा कि परिवार साथ रहते हुए भी अलग-अलग दुनिया में जी रहा है, मेरे जैसे समाज कार्य से जुड़े लोग अक्सर देखते हैं कि संवादहीनता ही तनाव की पहली सीढ़ी बनती है, मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ता बोझ, लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों और युवाओं के मन पर कई तरह से असर डालता है, नींद पूरी नहीं हो पाती, दिमाग लगातार उत्तेजित रहता है, सोशल मीडिया पर तुलना से आत्मविश्वास कम होता है, पढ़ाई का दबाव बढ़ता है

परिवार और समाज से दूरी बढ़ती है, अकेलापन और अवसाद बढ़ता है, लंबे समय में यही तनाव कई बार युवाओं को खतरनाक फैसलों, जैसे आत्महत्या की ओर धकेल देता है, समाधानः बदलाव की शुरुआत परिवार और समाज से, तकनीक को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं।

लेकिन इसे नियंत्रित करना जरूरी है, परिवार, शिक्षकों और समाज को मिलकर कुछ सरल कदम उठाने होंगे, भोजन के समय फोन-मुक्त माहौल बनाया जाए।

बच्चों को सुना जाए, उनकी भावनाओं को महत्व दिया जाए, स्क्रीन टाइम के स्पष्ट नियम बनें, योग, ध्यान और खेल जैसी गतिविधियाँ बढ़ें, स्कूल कॉलेज में काउंसलिंग की व्यवस्था मजबूत हो, सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों पर जागरूकता बढ़ाई जाए।

आकाश सिंह ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि बढ़ता स्क्रीन टाइम सिर्फ डिजिटल आदत नहीं, यह हमारी आने वाली पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है।, यदि परिवार और समाज समय रहते संवाद, समझ और भावनात्मक जुड़ाव को महत्व नहीं देंगे, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गहरी हो सकती है।

तकनीक का सही उपयोग, संवाद की वापसी और परिवार में आपसी समझ इन्हीं के सहारे हम एक स्वस्थ, सशक्त और मानसिक रूप से संतुलित समाज का निर्माण कर सकते हैं।

You May Also Like

More From Author

+ There are no comments

Add yours