विशेष कवरेज: लखनऊ के 326 (LCTSL) परिचालकों का भविष्य ‘नीलाम’ करने की तैयारी? सरकारी विज्ञप्ति से हुई भर्ती पर निजीकरण की तलवार
ब्यूरों लखनऊ : ओजस्वी किरण न्यूज़
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बड़ा प्रशासनिक घोटाला और मानवीय त्रासदी आकार ले रही है। लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड (LCTSL) के दुबग्गा डिपो में तैनात 326 संविदा परिचालकों ने शासन, प्रशासन और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष गुहार लगाते हुए अधिकारियों के ‘दोहरे चरित्र’ को उजागर किया है। यह मामला केवल नौकरी का नहीं, बल्कि सरकारी विज्ञापनों और वादों के साथ हो रहे खिलवाड़ का है।
सरकारी विज्ञप्ति का सच: जब विज्ञापन सरकारी, तो भविष्य निजी क्यों?

ओजस्वी किरण के पास उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, अक्टूबर 2021 में कार्यालय प्रबंध निदेशक, लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट द्वारा विज्ञप्ति संख्या 3279 और 3280 जारी की गई थी। इस विज्ञापन के आधार पर इंटरमीडिएट मेरिट और ‘सी.सी.सी.’ प्रमाण पत्र धारक युवाओं का चयन पूरी पारदर्शिता के साथ किया गया था। आज 5 साल की बेदाग सेवा के बाद, इन परिचालकों को झटका देते हुए अधिकारी इन्हें निजी फर्मों (प्राइवेट वेंडरों) के हाथों में सौंपने की साजिश रच रहे हैं।
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अधिकारियों का ‘दोहरा चरित्र’: अपनों को राहत, 2021 बैच को आफत
मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में एमडी अमरनाथ सहाय और वित्त सहायक अशोक मल्होत्रा पर सीधा निशाना साधा गया है। कर्मचारियों ने साक्ष्यों के साथ दावा किया है कि जहाँ वर्ष 2018 तक भर्ती हुए परिचालकों को अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए परिवहन निगम में समायोजित (स्थानांतरित) कर दिया, वहीं 2021 में भर्ती हुए परिचालकों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। उनकी नियमावली और योग्यता समान होने के बावजूद, उन्हें निगम में भेजने के बजाय निजी हाथों में बेचा जा रहा है।

विशेष विश्लेषण: क्या है 26 मई के नोटिस का असली सच?
इस आधिकारिक पत्र (संख्या-1130) को गहराई से देखने पर तीन बड़ी बातें सामने आती हैं, जो इन 326 परिचालकों के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसी हैं:
1. सरकारी भर्ती को ‘प्राइवेट’ में बदलने की चाल
जब 2021 में इन युवाओं ने नौकरी ज्वाइन की थी, तब इनका विज्ञापन ‘लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट’ (सरकारी संस्था) ने निकाला था। लेकिन अब इस नोटिस के जरिए प्रशासन इन्हें ‘मेसर्स एसएस एंटरप्राइजेज’ नाम की एक प्राइवेट कंपनी को सौंप रहा है। इसका मतलब है कि अब ये सरकारी कर्मी नहीं, बल्कि एक प्राइवेट ठेकेदार के मजदूर कहलाएंगे।
2. 24 घंटे का ‘अल्टिमेटम’ और दबाव
नोटिस 26 मई को जारी हुआ और दस्तावेज जमा करने की आखिरी तारीख 27 मई रखी गई। केवल 24 घंटे का समय देना यह दर्शाता है कि प्रशासन कर्मचारियों को सोचने या कानूनी सलाह लेने का मौका नहीं देना चाहता। यह सीधे तौर पर मानसिक उत्पीड़न है ताकि कर्मचारी डर के मारे प्राइवेट वेंडर की शर्तों पर दस्तखत कर दें।
3. भविष्य की सुरक्षा खत्म (The Trap)
इस नोटिस में ‘समायोजन’ (Adjustment) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन असल में यह एक ‘जाल’ है। एक बार अगर इन परिचालकों ने अपने मूल शैक्षिक दस्तावेज प्राइवेट वेंडर को सौंप दिए, तो विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगा। फिर कल को अगर प्राइवेट कंपनी इन्हें नौकरी से निकालती है, तो ये कहीं के नहीं रहेंगे।
अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल:
नोटिस में साफ लिखा है कि जो दस्तावेज नहीं देगा, वह खुद जिम्मेदार होगा। लेकिन सवाल यह है कि MD अमरनाथ सहाय और अशोक मल्होत्रा यह स्पष्ट क्यों नहीं कर रहे कि जब भर्ती सरकारी हुई थी, तो बीच रास्ते में ‘वेंडर’ को लाने की जरूरत क्यों पड़ी?
“वसूली सरकारी, नौकरी प्राइवेट?”
विस्फोटक सबूत : विभाग ने खुद ली थी ₹10,000 की ‘सिक्योरिटी मनी’

सरकारी रसीद ने खोली पोल; विभाग के खजाने में जमा हुए थे लाखों रुपये, फिर निजीकरण क्यों?
ओजस्वी किरण की पड़ताल में एक ऐसा दस्तावेज़ सामने आया है, जो अधिकारियों के ‘दोहरे चरित्र’ को पूरी तरह बेनकाब करता है। भर्ती के समय (नवंबर 2021), लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड ने प्रत्येक परिचालक से 10,000 रुपये प्रतिभूति (Security Money) के तौर पर जमा कराए थे।
इस रसीद के मुख्य बिंदु :
सीधी वसूली: रसीद पर स्पष्ट रूप से ‘लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड’ का नाम और आधिकारिक सिग्नेचर है।
किस मद में पैसा : रसीद में साफ़ लिखा है— ‘संविदा परिचालक प्रतिभूति’।
कोषाध्यक्ष के हस्ताक्षर: विभाग के कोषाध्यक्ष (Cashier) ने खुद यह पैसा प्राप्त किया है (रसीद संख्या-44)।
बड़ा सवाल: जब विभाग ने खुद को नियोक्ता (Employer) मानकर सरकारी रसीद पर पैसे जमा कराए, तो अब इन कर्मचारियों को निजी वेंडर के हवाले क्यों किया जा रहा है? अगर कर्मचारी सरकारी व्यवस्था का हिस्सा नहीं थे, तो विभाग ने सीधे पैसे क्यों लिए?
न्याय की मांग : ये रसीदें गवाह हैं कि 326 परिचालकों के साथ कानूनी और नैतिक तौर पर बड़ा छल किया गया है। सरकारी खजाने में पैसा भरने के बाद अब उन्हें ‘निजी हाथों’ में धकेलना सीधे तौर पर धोखा है।
विशेष कानूनी विश्लेषण : क्यों कटघरे में है प्रशासन?
इस पूरे प्रकरण में अधिकारियों की कार्यप्रणाली न केवल अमानवीय है, बल्कि कई संवैधानिक और कानूनी नियमों का खुला उल्लंघन भी करती है:
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन (समानता का अधिकार): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 स्पष्ट रूप से ‘समानता के अधिकार’ की बात करता है। जब एक ही विभाग में समान योग्यता वाले 2018 बैच के कर्मियों को निगम में समायोजित किया गया है, तो 2021 बैच को निजी वेंडर के हवाले करना ‘भेदभावपूर्ण’ और असंवैधानिक है।
प्रोमिसरी एस्टॉपेल (कानूनी वचनबद्धता): कानून के ‘प्रोमिसरी एस्टॉपेल’ सिद्धांत के अनुसार, यदि सरकार ने एक आधिकारिक विज्ञप्ति (3279/3280) के माध्यम से नियुक्ति की है, तो वह बीच रास्ते में नियम बदलकर कर्मचारियों के हितों को नुकसान नहीं पहुँचा सकती।
श्रम कानूनों की अवहेलना : पिछले 4 महीनों से वेतन न देना और यात्री संख्या के नाम पर 20-30% की कटौती करना ‘पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट’ का स्पष्ट उल्लंघन है।
मानसिक और आर्थिक शोषण की पराकाष्ठा
दुबग्गा डिपो के परिचालकों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि विभाग में वे ‘बंधुआ मजदूर’ जैसी स्थिति में रह रहे हैं। सैकड़ों परिवार दाने-दाने को मोहताज हैं। अधिकारियों द्वारा जानबूझकर ड्यूटी से वंचित करना और दूर-दराज के मार्गों पर भेजना अब सामान्य बात हो गई है।
”न्याय दो,या हमें खत्म होने दो”: आत्मदाह की चेतावनी
शासन स्तर पर बैठे उच्च अधिकारियों की चुप्पी से आहत होकर परिचालकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनका स्थानांतरण पूर्व की भाँति परिवहन निगम में नहीं किया गया, तो वे सामूहिक आत्मदाह के लिए विवश होंगे।
”हमारे भविष्य के साथ हो रहे इस अन्याय और अधिकारियों की मनमानी से हम टूट चुके हैं। यदि कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसके जिम्मेदार सीधे तौर पर MD LCTSL अमरनाथ सहाय और वित्त सहायक अशोक मल्होत्रा होंगे।” — पीड़ित परिचालक
ओजस्वी किरण का शासन से सीधा सवाल
क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, जो युवाओं के रोजगार और शुचिता के लिए जाने जाते हैं, उनकी नाक के नीचे लखनऊ के अधिकारी अपनी मनमानी चलाते रहेंगे? क्या सरकारी विज्ञप्ति के माध्यम से आए युवाओं को निजी लाभ के लिए वेंडरों को सौंप दिया जाएगा?
यह खबर अब लखनऊ के सचिवालय से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक गूँजनी चाहिए, ताकि 326 परिवारों का भविष्य अंधकार में डूबने से बच सके।

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