NEET PG Cut-Off विवाद: सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, NBEMS के फैसले को PIL में चुनौती
नई दिल्ली। NEET-PG 2025-26 की क्वालिफाइंग कट-ऑफ में हालिया बदलाव को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। इसी बीच अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। जानकारी के मुताबिक, नेशनल बोर्ड ऑफ एग्ज़ामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) द्वारा 13 जनवरी 2026 को जारी नोटिस के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। याचिका में कट-ऑफ घटाने को मनमाना बताते हुए कहा गया है कि इससे मेरिट, मरीजों की सुरक्षा और मेडिकल शिक्षा के मानक प्रभावित हो सकते हैं।
ओजस्वी किरण | एजुकेशन डेस्क

क्या है पूरा विवाद?
रिपोर्ट्स के अनुसार, 13 जनवरी 2026 को NBEMS ने NEET-PG 2025-26 के लिए योग्यता (Qualifying) कट-ऑफ प्रतिशत में संशोधन किया। इसके बाद डॉक्टर संगठनों और कई अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई कि कट-ऑफ में हुई बड़ी कटौती से परीक्षा की चयन प्रक्रिया कमजोर होगी और पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता को नुकसान पहुंच सकता है।
याचिका किसने दाखिल की?
जानकारी के मुताबिक, यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन, न्यूरोसर्जन डॉ. सौरव कुमार, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल और वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन से जुड़े डॉ. आकाश सोनी की ओर से दायर की गई है।
याचिका में कहा गया है कि कट-ऑफ को असामान्य रूप से कम कर देने से प्रवेश प्रक्रिया में योग्य उम्मीदवारों के चयन पर असर पड़ सकता है।
मामला एक नजर में
13 जनवरी 2026 को NBEMS ने NEET-PG कट-ऑफ में बदलाव किया।
बदलाव के बाद कट-ऑफ को बहुत नीचे तक घटाने को लेकर सवाल उठे।
कई अभ्यर्थियों और डॉक्टर संगठनों ने इस फैसले पर विरोध जताया।
आरोप है कि इससे मेरिट सिस्टम कमजोर हो सकता है।
अब इस निर्णय को लेकर सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल की गई है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन की दलील
बताया जा रहा है कि याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा के मानकों में इस तरह की कटौती अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन व सुरक्षा का अधिकार) से जुड़ी चिंताओं को जन्म देती है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मेडिकल क्षेत्र सीधे तौर पर मानव जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए योग्यता मानकों में अत्यधिक ढील भविष्य में मरीजों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है।
मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर उठे सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि केवल सीटें भरने के लिए मानकों में कटौती करना प्रतियोगी परीक्षा की गंभीरता को कम करता है। साथ ही इससे पीजी स्तर पर कौशल, योग्यता और गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
आगे सुप्रीम कोर्ट का रुख होगा निर्णायक
अब इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अहम माना जा रहा है। मेडिकल छात्रों, डॉक्टर संगठनों और शिक्षा जगत की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत आगे क्या दिशा तय करती है।

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