यूपी पंचायत चुनाव में देरी लगभग तय, विधानसभा चुनाव (2027) के बाद होने की बढ़ी संभावना

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यूपी पंचायत चुनाव में देरी लगभग तय, विधानसभा चुनाव (2027) के बाद होने की बढ़ी संभावना

ओबीसी आरक्षण “ट्रिपल टेस्ट”, आयोग गठन में देरी और वोटर लिस्ट संशोधन बना सबसे बड़ा रोड़ा

ओजस्वी किरण डेक्स

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव (ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत व जिला पंचायत) अप्रैल-मई 2026 में कराने की तैयारियां अब प्रभावित होती नजर आ रही हैं। चुनाव में देरी की सबसे बड़ी वजह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को लेकर समर्पित आयोग का गठन अब तक न होना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला पूरा न हो पाना बताया जा रहा है।
राज्य में ग्राम, क्षेत्र और जिला पंचायतों का कार्यकाल मई से जुलाई 2026 के बीच समाप्त होने जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आयोग के गठन के बाद सर्वे, डेटा संग्रह और रिपोर्ट तैयार होने में कम से कम 4 से 6 माह लग सकते हैं। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि पंचायत चुनाव नवंबर 2026 तक खिसक सकते हैं या फिर 2027 विधानसभा चुनाव के बाद कराए जा सकते हैं।

देरी की सबसे बड़ी वजह: ओबीसी आयोग का गठन लंबित
जानकारी के मुताबिक पंचायती राज विभाग ने 6 सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठन का प्रस्ताव भेजा है, लेकिन सरकारी मंजूरी न मिलने से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
आयोग गठन के बिना न तो ओबीसी जनसंख्या का सर्वे संभव है और न ही नई आरक्षण सूची तैयार हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का “ट्रिपल टेस्ट” अनिवार्य
ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विकास किशनराव गवली केस में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि—
✅ डेटा संग्रह (सामाजिक-आर्थिक सर्वे)।
✅ ओबीसी आरक्षण की पर्याप्तता तय करना।
✅ कुल आरक्षण 50% सीमा के अंदर रखना।
इन शर्तों को पूरा किए बिना पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण लागू करना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
समय की कमी: मार्च-अप्रैल में अधिसूचना जारी होना मुश्किल
सूत्रों के अनुसार आयोग गठन के बाद जिला स्तर पर जांच, डेटा संकलन और रिपोर्टिंग में 4 से 6 महीने लग सकते हैं। ऐसे में मार्च-अप्रैल 2026 तक चुनाव अधिसूचना जारी करना लगभग असंभव माना जा रहा है।

वोटर लिस्ट (SIR) विवाद ने बढ़ाई उलझन

पंचायत चुनाव की तैयारी में दूसरा बड़ा रोड़ा मतदाता सूची संशोधन (SIR) भी माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार SIR ड्राफ्ट में करीब 2.89 करोड़ नाम हटाए जाने की चर्चा है, जिसके बाद बहाली प्रक्रिया तेज हुई।
बताया जा रहा है कि अंतिम मतदाता सूची मार्च 2026 तक टल सकती है, जिससे चुनाव प्रक्रिया और पीछे जा सकती है।
प्रशासनिक वजहों के साथ राजनीतिक रणनीति भी चर्चा में
हालांकि कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल खुले तौर पर पंचायत चुनाव टालने की मांग नहीं कर रहा, लेकिन यह भी माना जा रहा है कि सभी दलों की प्राथमिकता 2027 विधानसभा चुनाव पर केंद्रित है।
राजनीतिक गलियारों में पंचायत चुनाव को लेकर “रणनीतिक देरी” की भी चर्चा है, क्योंकि पंचायत चुनाव को अक्सर “सेमीफाइनल” माना जाता है।

दलों की तैयारी,किसका क्या स्टैंड

भाजपा: विधानसभा चुनाव की तैयारी में लग गई है लेकिन जिला पंचायत स्तर पर पकड़ बनाए रखने के लिए चुनाव समय पर कराने के पक्ष में सक्रिय नजर आ रही है।

सपा-बसपा: जिला स्तर पर सीमित हस्तक्षेप, “प्ले-सेफ” रणनीति।

 कांग्रेस: वोटर लिस्ट विवाद को मुद्दा बना रही है, लेकिन चुनाव टालने की स्पष्ट मांग नहीं।

हाईकोर्ट में PIL भी बनी दबाव की वजह

सूत्रों के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) भी दाखिल की जा चुकी है, जिससे आयोग गठन और चुनाव प्रक्रिया पर दबाव बढ़ा है।
दावेदार मैदान में, लेकिन तस्वीर अभी धुंधली
प्रदेशभर में ग्राम प्रधान से लेकर जिला पंचायत सदस्य पद के दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। गांवों में बैठकों का दौर, जनसंपर्क और गुटबंदी तेज है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर चुनाव की तारीख को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं।

यूपी पंचायत चुनावों में देरी की वजह मुख्य रूप से ओबीसी आरक्षण का कानूनी ढांचा, आयोग गठन में विलंब, और मतदाता सूची संशोधन जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं। हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी चुनाव समय को प्रभावित कर सकती हैं। अब अंतिम निर्णय सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की आगामी रणनीति पर निर्भर करेगा।

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