लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर भीषण हादसा: नींद की झपकी और प्रशासनिक सुस्ती ने ली 6 की जान, 19 घायल, ट्रामा सेंटर रेफर
लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर पलटी डबल डेकर बस, 6 यात्रियों की मौत, परिवहन विभाग की लापरवाही उजागर
ओजस्वी किरण ब्यूरों
उन्नाव/लखनऊ : रफ्तार के कहर और प्रशासनिक अनदेखी के कारण उत्तर प्रदेश के लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर एक बार फिर खून बहा है। उन्नाव जिले के औरास थाना क्षेत्र में सोमवार देर रात यात्रियों से भरी एक तेज रफ्तार डबल डेकर बस अनियंत्रित होकर पलट गई। इस दर्दनाक सड़क हादसे में 6 श्रद्धालुओं/यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 19 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। चीख-पुकार के बीच स्थानीय पुलिस और यूपीडा (UPEIDA) की टीम ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर घायलों को बाहर निकाला, जिनमें से कई गंभीर घायलों को लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) ट्रामा सेंटर रेफर किया गया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए जिला प्रशासन के अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर राहत कार्य तेज करने और घायलों के समुचित इलाज के निर्देश दिए हैं।
नींद की झपकी बनी काल, रेलिंग तोड़कर पलटी बस
प्राप्त जानकारी के अनुसार, डबल डेकर बस यात्रियों को लेकर जा रही थी। औरास क्षेत्र के पास अचानक चालक को नींद की झपकी आ गई, जिससे उसका वाहन पर से नियंत्रण छूट गया। रफ्तार इतनी तेज थी कि बस एक्सप्रेसवे की सुरक्षा रेलिंग को तोड़ती हुई पलट गई। आधी रात को हुए इस हादसे के बाद एक्सप्रेसवे पर चीख-पुकार मच गई। सूचना मिलते ही स्थानीय औरास थाने की पुलिस और यूपीडा के सुरक्षाकर्मी मौके पर पहुंचे और बस के शीशे तोड़कर फंसे हुए यात्रियों को बाहर निकाला।
कागजों पर सिमटे सुरक्षा के दावे : आखिर शासन-प्रशासन कब जागेगा?
इस भीषण हादसे ने एक्सप्रेसवे पर यात्रियों की सुरक्षा को लेकर शासन और परिवहन विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक्सप्रेसवे पर लगातार हो रहे हादसों के पीछे आरटीओ (RTO) और हाइवे पुलिस की बड़ी लापरवाही सामने आ रही है:
रूट पेट्रोलिंग और अलर्ट सिस्टम फेल : एक्सप्रेसवे पर नियम है कि रात के समय चालकों को नींद से बचाने के लिए समय-समय पर चेकिंग या चाय की व्यवस्था और यूपीडा की पेट्रोलिंग गाड़ियां सायरन बजाकर चलती हैं। लेकिन धरातल पर यह व्यवस्था पूरी तरह सुस्त नजर आ रही है।
फिटनेस और ओवरलोडिंग पर सुस्ती : देश के सबसे आधुनिक एक्सप्रेसवे पर बिना फिटनेस और मानकों के विपरीत दौड़ने वाली डबल डेकर बसों पर परिवहन विभाग अंकुश लगाने में नाकाम रहा है। रात के अंधेरे में लंबी दूरी तय करने वाले चालकों की शारीरिक स्थिति और उनके वर्किंग आवर्स (काम के घंटे) की जांच करने वाला कोई नहीं है।
ब्लैक स्पॉट और सुस्त मॉनिटरिंग : एक्सप्रेसवे पर जिन जगहों पर अक्सर हादसे होते हैं, वहां गति सीमा को नियंत्रित करने और ड्राइवरों को अलर्ट करने वाले आधुनिक इंतजाम सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गए हैं।
फिलहाल पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और दुर्घटनाग्रस्त बस को हाइवे से हटाकर यातायात सुचारू कराया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि हर हादसे के बाद जांच की बात कहने वाला प्रशासन आखिर कब ठोस कदम उठाएगा ताकि एक्सप्रेसवे पर मासूमों की बलि चढ़ने से रोकी जा सके।

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