.राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ : विचार, त्याग और राष्ट्रनिर्माण का विराट अध्याय

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प्रो.राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ : विचार, त्याग और राष्ट्रनिर्माण का विराट अध्याय

ओजस्वी किरण डेक्स

भारतीय राष्ट्र जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव संगठन, कालखंड और विचारधाराओं की सीमाओं से परे जाता है। प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ ऐसे ही व्यक्तित्व थे। शिक्षाविद्, संगठनकर्ता और राष्ट्र चिंतक के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिशा दी और भारतीय लोकतांत्रिक चेतना को भी गहराई से प्रभावित किया।

स्वाधीनता आंदोलन और आरएसएस से संपर्क

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान रज्जू भैया सक्रिय रूप से स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े। यही वह समय था जब उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ। इस संपर्क ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।

इसके बाद संघ का विचार, अनुशासन और राष्ट्रदृष्टि उनके जीवन के स्थायी आधार बन गए। वे स्वयं कहा करते थे कि संघ ने उन्हें राष्ट्र को देखने की दृष्टि दी।

विश्वविद्यालय से संगठन तक : एक ऐतिहासिक त्याग

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक सफल, प्रतिष्ठित और सुरक्षित शैक्षणिक करियर के बावजूद 1966 में उन्होंने स्वेच्छा से अपने विश्वविद्यालय पद से इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रांत प्रचारक के रूप में पूर्णकालिक सेवा स्वीकार की। यह निर्णय उनके त्याग, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्ट्रसेवा के प्रति निष्ठा का प्रतीक माना जाता है।

संगठनात्मक उत्कर्ष : उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय दायित्व तक

उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक कार्य करते हुए रज्जू भैया ने अनुशासित, वैचारिक और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की एक सशक्त पीढ़ी तैयार की।

यहीं से उनका राष्ट्रीय दायित्वों की ओर क्रमिक उत्थान हुआ और 1980 के दशक में वे संघ के सर कार्यवाह (महासचिव) बने। इस भूमिका में उन्होंने संघ की कार्यप्रणाली को अधिक व्यापक, संवादशील और समाजोन्मुख बनाया।

1994 में उन्हें बालासाहेब देवरस का उत्तराधिकारी नामित कर सरसंघचालक बनाया गया। जीवित रहते हुए उत्तराधिकारी की घोषणा संघ इतिहास की एक दुर्लभ और अत्यंत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।

राजनीतिक नेतृत्व से संवाद और मार्गदर्शन

उत्तर प्रदेश में कार्यकाल के दौरान रज्जू भैया का संपर्क और कार्य कई प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के साथ रहा। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर और वी.पी. सिंह जैसे नेताओं के साथ निकटता से काम किया।

उनकी विशेषता यह थी कि वे विचारधारात्मक मतभेदों के बावजूद संवाद और सौहार्द बनाए रखते थे।

प्रख्यात शिक्षाविद् एवं राजनेता मुरली मनोहर जोशी उनके अत्यंत प्रिय एवं श्रेष्ठ विद्यार्थियों में गिने जाते हैं—यह तथ्य रज्जू भैया की शिक्षक के रूप में गहरी छाप को दर्शाता है।

छह वर्षों का कार्यकाल : संघ और राष्ट्र के लिए निर्णायक काल

सरसंघचालक के रूप में रज्जू भैया का लगभग छह वर्ष का कार्यकाल संघ और भारत—दोनों के लिए अत्यंत निर्णायक माना जाता है।

राम जन्मभूमि आंदोलन के वैचारिक संतुलन, संगठन के सामाजिक विस्तार और बौद्धिक संवाद की परंपरा को उन्होंने सुदृढ़ किया।

उनका संबंध केवल संघ या राजनीति तक सीमित नहीं था। शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं के साथ उनका संवाद समान रूप से सहज और सम्मानपूर्ण था।

विचारधारा : समन्वय, स्वदेशी और चरित्र निर्माण

रज्जू भैया के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व था।

वे स्वदेशी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता और शिक्षा के माध्यम से चरित्र निर्माण के प्रबल समर्थक थे।

विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन को वे आधुनिक भारत के विकास की कुंजी मानते थे—एक ऐसा दृष्टिकोण जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

एक शांत राष्ट्रनिर्माता

प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्चा राष्ट्रनिर्माण शोर से नहीं, संस्कार, संवाद और सतत सेवा से होता है।

उनका व्यक्तित्व वैचारिक दृढ़ता के साथ मानवीय सौम्यता का अद्भुत उदाहरण है। आज भी भारतीय राष्ट्रचिंतन में उनका नाम एक स्थायी प्रेरणा के रूप में स्मरण किया जाता है।

(यह लेख लेखिका के अध्ययन, वैचारिक विश्लेषण एवं सार्वजनिक ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है)

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