“डबल पथरी और डबल उम्मीद”
डॉ इलाक्षी शुक्ला, उप-संपादक
हाल ही में एक मरीज के परिजन का फोन आया। आवाज़ में चिंता कम और आत्मविश्वास अधिक था। उन्होंने बताया कि उनके भाई को “डबल पथरी” है और आयुष्मान कार्ड से स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल में भर्ती कराकर इलाज कराया जाना है। मैंने सहानुभूति के साथ आश्वासन दिया कि इलाज समय पर और सही ढंग से हो जाएगा। लेकिन बातचीत यहीं समाप्त नहीं हुई।
अगले ही क्षण उन्होंने एक और अपेक्षा रख दी—कि इलाज के दौरान आयुष्मान कार्ड से कुछ पैसा भी निकलवा दिया जाए और यदि दस हजार रुपये मिल जाएँ तो उनका “काम चल जाएगा।” यह सुनकर मैं कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गयी। इलाज मुफ्त, जांच मुफ्त, दवाइयाँ मुफ्त और ऑपरेशन भी मुफ्त—इसके बावजूद नकद लाभ की अपेक्षा! यह सवाल मन में उठने लगा कि यह अज्ञानता है, लालच है या सोच की गंभीर बीमारी।
सरकार गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, ताकि कोई भी नागरिक इलाज के अभाव में परेशान न हो। अस्पताल, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात सेवा में लगे हैं। इसके बावजूद कुछ लोग इन योजनाओं को सेवा नहीं, बल्कि कमाई का साधन मानने लगे हैं।
आज स्थिति यह है कि बीमारी को दुख नहीं, अवसर समझा जाने लगा है। इलाज का उद्देश्य जीवन बचाना नहीं, बल्कि “कुछ अतिरिक्त लाभ” प्राप्त करना हो गया है। यह मानसिकता धीरे-धीरे समाज की जड़ों को कमजोर कर रही है।
यदि समय रहते हमारी सोच नहीं बदली, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग इलाज के साथ अन्य सुविधाओं की भी मांग करने लगेंगे। सरकारी योजनाएँ सहयोग और सुरक्षा के लिए होती हैं, सौदेबाजी के लिए नहीं। इसलिए अब आवश्यकता है कि हम केवल शरीर का नहीं, अपनी सोच का भी इलाज करें, तभी समाज सचमुच स्वस्थ बन सकेगा।

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