समान कार्य, असमान वेतन,
महिला सशक्तिकरण की राह में चुनौती
डॉ इलाक्षी शुक्ला, उप-संपादक
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
आज का समय महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उपलब्धियों का साक्षी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, उद्योग, विज्ञान और राजनीति—लगभग हर क्षेत्र में महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रही हैं। योग्यता, परिश्रम और जिम्मेदारी के स्तर पर वे किसी से कम नहीं हैं।
फिर भी एक चिंताजनक वास्तविकता यह है कि कई स्थानों पर समान पद और समान कार्य करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण बताते हैं कि औसतन महिलाओं को पुरुषों की तुलना में लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक कम वेतन प्राप्त होता है।
यह असमानता केवल वेतन तक सीमित नहीं है। पदोन्नति और नेतृत्व के अवसरों में भी कई बार महिलाओं को पीछे रखा जाता है। कुछ संस्थानों में अब भी यह धारणा देखने को मिलती है कि विवाह या मातृत्व के बाद महिलाएँ अतिरिक्त जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभा नहीं पाएँगी। इसी सोच के कारण कई बार योग्य और सक्षम महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों और जिम्मेदारियों से वंचित कर दिया जाता है।
वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। आज की महिला परिवार और कार्यस्थल दोनों की जिम्मेदारियों को संतुलित करते हुए उत्कृष्ट कार्य कर रही है। विज्ञान, प्रशासन, खेल, व्यापार और राजनीति जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि अवसर मिलने पर वे प्रभावी नेतृत्व और उत्कृष्ट परिणाम देने में पूरी तरह सक्षम हैं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर है। महिलाओं के प्रति सम्मान और प्रशंसा महत्वपूर्ण है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि कार्यस्थलों पर समान वेतन, समान अवसर और निष्पक्ष पदोन्नति सुनिश्चित की जाए।
जब समाज महिलाओं की क्षमता पर पूर्ण विश्वास करेगा और निर्णय केवल योग्यता के आधार पर होंगे, तभी सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण संभव होगा।
एक प्रगतिशील और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव समाप्त किया जाए और महिलाओं को भी वही अवसर और सम्मान मिले, जिसके वे वास्तव में अधिकार रखती हैं।

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